मुद्दा आज राजनीतिक नहीं है , मुद्दा है असमानता का जो आज बिहार के एक होनहार कलाकार ने मुंबई जाकर अपनी अलग पहचान बनाई I और लगातार विगत 8 से 10 महीने तक वह भाई भतिजावाद का शिकार बना।

मैं आपसे पूछना चाहती हूं क्या कोई होनहार और अच्छे कलाकार की कोई जरूरत नहीं है आज हमारे फिल्म इंडस्ट्री को ।

कब तक यह भाई-भतीजावाद प्रतिभा को प्रभावित करता रहेगा

खास करके बिहार, उत्तर प्रदेश ,बंगाल और मिडिल क्लास के लोग जो सिनेमाघरों में जाते हैं और हीरो के कलाकारी की प्रशंसा करते हैं खुशियां मनाते हैं आज आपके ही क्षेत्र का एक कलाकार को फिल्मो मैं अपनी काबिलियत से पहचान बनाई और फिर छीन लेने का कोशिश किया यह भाई जातिवाद नहीं है तो और क्या है?

क्या यह पैसे की तंगी का वजह है मौत? धार्मिक, जातिवाद पर तो चर्चाएं बहुत होती पर इस भाई भतीजावाद पड़ क्यों नहीं? क्या फिल्म इंडस्ट्री कुछ हीरो डायरेक्टर्स या प्रोडक्शन हाउस के हाथ की कठपुतली बन गया है?

भाई भतीजावाद तो बहुत पुरानी रीत है लेकिन आज यह इतना हद से गिर चुका है कि कोई अपना जान देकर इसका हल समझता है?हीरो सिर्फ फिल्मों में अच्छा काम करने से हीरो नहीं कहलाता एक प्रतिभावान कलाकार को बराबर का सम्मान देने से हीरो हीरो कहलाता है .हम उनकी फिल्मों को देख करके उनके कार्य को सराहाते हैं उन्हें हीरो बनाते हैं अपना आईडल मानते हैं ।और आज भाई भतीजावाद की परंपरा के सामने हमारे होनहार कलाकार के जान की कोई कीमत नहीं ? आप बताएं कब तक चलेगा यह? क्या इसका कोई अंत नहीं?

कुछ दिनों तक यह किसी प्रकार का विशेष टिप्पणी नहीं करेंगे शांत हो जाएंगे और सोचेंगे की कुछ दिनों में सब कुछ ठीक हो जाएगा लेकिन आप बताएं इसका हल कि कल कोई और सुशांत सिंह राजपूत को ऐसा भाई भतीजावाद का सामना ना करना पड़ेI

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